पिछले दो दिनों से सोशल मीडिया के हर प्लेटफॉर्म पर बेंगलुरु के इंजीनियर अतुल सुभाष की तस्वीरें और वीडियो वायरल है। #BengaluruSuicideCase #divorce #JusticeForAtulSubhash जैसी तमाम हैशटैग ट्रेंड में है। लेकिन मसला ये है कि क्या जिस सिस्टम की वजह से अतुल को अपनी जान गंवानी पड़ी.... उसमें कुछ तब्दीली होगी या अतुल की सुसाइड महज़ कुछ दिनों के लिए ट्रेंडिंग खब़र बनकर रह जाएगी?? क्या न्याय व्यवस्था और कानून प्रक्रिया पर एक बार फिर से नए सिरे से विचार-विमर्श की जरूरत समझी जाएगी या फिर किसी नए अतुल का इंतज़ार रहेगा??
ये बहुत दुर्भाग्य है कि आज़ादी के करीब 76 साल बाद भी न्याय व्यवस्था एक हंसते-खेलते परिवार की खुशी लील गई!! जिस उम्र में बुजुर्ग माता-पिता का सबसे भरोसेमंद बैसाखी उसका बेटा होता है, सिस्टम में बैठे भ्रष्ट लोगों की वजह से उस भरोसेमंद बैसाखी को हमेशा-हमेशा के लिए टूट जाना पड़ा...…और न जाने आगे कितने अतुल सुभाष जैसे भरोसेमंद बैसाखी को टूटकर खत्म हो जाना अभी बाकी है!
उम्मीद तो कम है लेकिन फिर भी यह देखना होगा कि न्याय के अंतिम दरवाजे सुप्रीम कोर्ट और देश के तमाम न्यायविद् व जिम्मेदार लोग इस मामले के बाद कोई ठोस कदम उठाते हैं या इंजीनियर अतुल सुभाष का मामला बस केस नंबर के रूप में दर्ज होकर रह जाएगा.....
एक मशहूर शेर है...
"जलते घरों को देखने वालों
फूंस का छप्पर आपका है...
आग के पीछे तेज़ हवा है
आगे मुकद्दर आपका है...
उसके क़त्ल पर मैं भी चुप था
अब मेरी बारी आई...
मेरे क़त्ल पर तुम भी चुप हो
अगला नंबर आपका है!!"
No comments:
Post a Comment