Thursday, December 19, 2024

क्या एक बार फिर से ठगे गए अंबेडकरवादी?

 (( क्या एक बार फिर से ठगे गए अंबेडकरवादी?))


लंबे समय से सन्नाटा पसरा था.... कोई मौका ही नहीं मिल रहा था कि हो-हल्ला मचाया जाए, लोगों को बरगलाया जाए.... आंबेडकर के नाम पर राजनीति की सौदेबाज़ी की जाए और आंबेडकर के नाम पर अंबेडकरवादियों को ही ठगा जाए। ऐसा लग रहा था कि इस साल को सन्नाटे में ही खत्म हो जाना लिखा है.....

लेकिन फिर एक दिन मौका आया..…संसद के राज्यसभा सदन में गृहमंत्री Amit Shah संविधान की गौरवशाली यात्रा विषय पर अपनी बात सदन पटल पर रख रहे थे। साथ-साथ विपक्ष में बैठे राजनीतिक दलों की पोल भी खोल रहे थे‌, कि आखिर कैसे बड़े ही चालाकी से अंबेडकर के नाम पर लोगों को ठगने का कार्य प्रगति पर है! कैसे लंबे समय तक सत्तासीन रही और अभी विपक्ष में बैठी कांग्रेस बाबासाहेब आंबेडकर को अपमान करते आई है.... आखिर क्यों आंबेडकर को अपने समय में अपने पद से इस्तीफा देना पड़ा.....जिस संविधान की प्रति लेकर कांग्रेस के तमाम बड़े नेता संसद के साथ-साथ सार्वजनिक मंचों पर लहराते नज़र आते हैं, अपनी कुर्सी बचाने के लिए कैसे संविधान को ही मज़ाक बनाकर रख दिया था..... आंबेडकर को अपनाने और उन्हें भारतरत्न से सम्मानित करने में कांग्रेस को इतना वक्त क्यों लग गया.... धर्म के आधार पर देश के दो हिस्सों में बांटने के फैसले का विरोध करने वाले भीमराव आंबेडकर को तब क्यों नहीं सुना-समझा गया... देशहित के कई मुद्दों पर अंबेडकर को क्यों कांग्रेस की नज़रअंदाज़गी झेलनी पड़ी?? 

विपक्ष में बैठी कांग्रेस और उसकी सहयोगी राजनीतिक पार्टी गृहमंत्री अमित शाह के हर सवाल पर सहमी नज़र आ रही थी....इस पोल खोल रूप को देखकर बीच-बीच में कई वरिष्ठ नेता बौखला भी गए कि आखिर गृहमंत्री जी को एक ही दिन में विपक्ष को इतना छीलने की क्या ही जरूरत आन पड़ी.... वैसे भी साल ख़त्म होने को है, कुछ सच्चाई अगले साल के लिए भी रहने देते! एक ही दिन में इतना बखिया उधेड़ने पर क्यों तुले हैं.....एक तो मौका नहीं हाथ लग रहा, ऊपर से तरकस से लगातार शब्दभेदी बाण से छलनी किए जा रहे हैं.... कोई इतना बेरहम कैसे हो सकता है!!

तभी मन ही मन त्राहिमाम-त्राहिमाम कर रहे विपक्षी पार्टियों को गृहमंत्री अमित शाह के वक्तव्य में एक उम्मीद की किरण दिखाई दी.... उनकी आंखें चमकी जैसे संजीवनी मिल गई हो! ये उम्मीद की किरण के बजाए 'मौके की किरण' कही जाए तो ज़्यादा न्यायसंगत होगा। करीब डेढ़ घंटे के भाषण में पोल खोल गृहमंत्री जी की 11 सेकेंड की वक्तव्य सुनकर विपक्षी खेमे के 'माननीय' का मन एकदम से लोटने-पोटने लगा। दिमाग में हरकत की बत्ती जलने-बुझने लग गई.... वजह, एक बार फिर से अंबेडकरवादियों को अंबेडकर के नाम पर ही ठगने का... बरगलाने का मौका साफ़ नज़र आ रहा था।

संसद से बाहर निकलते ही विपक्ष के सभी 'माननीय' अपने टेक्निकल टीम को एक्टिव होने का हुक्म सुनाया.... इसके साथ ही सभी सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म की टेक्निकल फौजें एक्टिव हो गई।

विपक्षी टीम के टेक्निकल फौजों को भी #BJP के तथाकथित IT सेल के फौजों से दो-दो हाथ करने की 'मौके की आग' दिखी.... अपने हुक्मरानों को भी साबित करना था कि देखिए अपने टेक्निकल फौजों को इतना भी निकम्मा-निकठ नहीं समझिए। कुछ देर में #babasahebambedkar #तड़ीपार_माफ़ी_मांग #ambedkar हैशटैग ट्रेंड करने लगा। माहौल बन चुका था.... सभी के सभी विपक्षी 'माननीयों' ने सोशल मीडिया के तमाम प्लेटफॉर्म पर इस बात की गवाही दी कि गृहमंत्री अमित शाह ने आंबेडकर का अपमान किया है....उनकी 11 सेकेंड की वक्तव्य की आधी-अधूरी वीडियो क्लिप इस बात की तस्दीक करती है....

सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म की टेक्निकल फौजों ने साबित किया कि अब हम भी किसी से कम नहीं हैं....उनका ये साबित करना जायज़ भी है और इस खुराफात के लिए पीठ भी थपथपाए जाने चाहिए! उन्हें कोई अजीज़ विशिष्ट टाइप का पुरस्कार भी दिया जाना चाहिए जो कि आनन-फानन में गृहमंत्री अमित शाह को प्रेस कॉन्फ्रेंस करने पर मजबूर कर दिया। 

मज़े की बात ये है कि एक तरफ खुद को अंबेडकरवादी मानने वाले सैकड़ों-हजारों लोग फिर से सड़क पर उतरने की हुंकार भर रहे हैं तो वहीं दूसरी तरफ अंबेडकर के नाम पर लोगों को छलने वाले लोग इस खुशी में हैं कि अंबेडकरवादियों को इस बात की ज़रा भी इल्म नहीं कि वो फिर से ठगे जा रहे हैं....

अंत में यही कहना चाहूंगा कि खुद से पढ़ना-लिखना बहुत ज़रूरी है.... अगर वाकई डॉ भीमराव आंबेडकर पढ़े-समझे गए होते तो आज ये विडंबना नहीं देखना पड़ता। आंबेडकर की आत्मा भी अपने को अंबेडकरवादी कहने वाले लोगों को देखकर तड़प रही होगी.... साथ ही ये भी देख रही होगी कि कैसे इस देश की तमाम राजनीतिक पार्टियां और लोग फायदे के हिसाब से अपने-अपने कई अंबेडकर गढ़े हैं !


जय हो!!

Thursday, December 12, 2024

ये हत्यारी न्याय प्रक्रिया....

 पिछले दो दिनों से सोशल मीडिया के हर प्लेटफॉर्म पर बेंगलुरु के इंजीनियर अतुल सुभाष की तस्वीरें और वीडियो वायरल है। #BengaluruSuicideCase #divorce #JusticeForAtulSubhash जैसी तमाम हैशटैग ट्रेंड में है। लेकिन मसला ये है कि क्या जिस सिस्टम की वजह से अतुल को अपनी जान गंवानी पड़ी.... उसमें कुछ तब्दीली होगी या अतुल की सुसाइड महज़ कुछ दिनों के लिए ट्रेंडिंग खब़र बनकर रह जाएगी?? क्या न्याय व्यवस्था और कानून प्रक्रिया पर एक बार फिर से नए सिरे से विचार-विमर्श की जरूरत समझी जाएगी या फिर किसी नए अतुल का इंतज़ार रहेगा?? 

ये बहुत दुर्भाग्य है कि आज़ादी के करीब 76 साल बाद भी न्याय व्यवस्था एक हंसते-खेलते परिवार की खुशी लील गई!! जिस उम्र में बुजुर्ग माता-पिता का सबसे भरोसेमंद बैसाखी उसका बेटा होता है, सिस्टम में बैठे भ्रष्ट लोगों की वजह से उस भरोसेमंद बैसाखी को हमेशा-हमेशा के लिए टूट जाना पड़ा...…और न जाने आगे कितने अतुल सुभाष जैसे भरोसेमंद बैसाखी को टूटकर खत्म हो जाना अभी बाकी है!

उम्मीद तो कम है लेकिन फिर भी यह देखना होगा कि न्याय के अंतिम दरवाजे सुप्रीम कोर्ट और देश के तमाम न्यायविद् व जिम्मेदार लोग इस मामले के बाद कोई ठोस कदम उठाते हैं या इंजीनियर अतुल सुभाष का मामला बस केस नंबर के रूप में दर्ज होकर रह जाएगा.....


एक मशहूर शेर है...


"जलते घरों को देखने वालों 

फूंस का छप्पर आपका है...

आग के पीछे तेज़ हवा है 

आगे मुकद्दर आपका है... 

उसके क़त्ल पर मैं भी चुप था 

अब मेरी बारी आई...

मेरे क़त्ल पर तुम भी चुप हो 

अगला नंबर आपका है!!"