रेलिया बैरन
प्रयागराज से वाराणसी जाना था। मैं इलाहाबाद सिटी स्टेशन नियत समय पर पहुँचकर विभूति एक्सप्रेस के जनरल बोगी में सवार था। उस जनरल बोगी में न अधिक भीड़ थी और नाही कोई खाली सीट दिख रही थी, अत: मैं दूसरी तरफ दरवाजे के समीप खड़ा हो गया। खाली सीट न रहने पर मैं भी एक-दो बार रेलवे की आचार संहिता व नियम को ताक पर रखकर दरवाजे की सीढ़ी को सीट समझकर बैठा हूँ और सफर किया हूँ। मगर, आज यहाँ भी दो युवा पहले से बैठे थे। इसलिए अपना बैग ऊपर लगी रेक पर रखकर खड़ा रहने के सिवा कोई चारा नहीं था। मेरे पीछे लम्बी सीट के कार्नर पर एक शादीशुदा महिला गुलाबी साड़ी पहने बड़ी इत्मीनान से बैठी थी.... जी हां, पहली दफा में मुझे इत्मीनान से ही बैठी हुई लगी थी। उसकी उम्र महज़ 28 साल के आसपास रही होगी। सामने सीढ़ी पर बैठे युवा एक-दूसरे से हंसी-मज़ाक करते अपने फोन के कैमरा से सेल्फी पर सेल्फी लिये जा रहे थें। ट्रेन के खुलने का समय हो चुका था। एक लम्बी 'पों' के भारी हार्न के साथ गाड़ी धीरे-धीरे आगे बढ़ने लगी। इसी के साथ स्टेशन, प्लेटफार्म पर खड़े लोग, शहर की ओर दिख रहें बड़े-छोटे मकान, पेड़-पौधे और बैनर-पोस्टर पीछे छुटने लगें। गाड़ी स्पीड पकड़ चुकी थी और मैं भी मन ही मन 'अलविदा इलाहाबाद, फिर मिलेंगे' कहते हुये पीछे छूटने शहर को देख रहा था।
अचानक हवा के साथ आयी गंध ने मुझे आभास कराया कि सामने सीढ़ी पर बैठे दोनों व्यक्ति शराब पी रखी है। कार्नर पर बैठी महिला को देख-देखकर उनकी कानाफ़ूसी भी बढ़ती जा रही थी। वे आपस में कुछ इशारा कर रहे थे और शरारती हंसी हंसे जा रहे थे। मेरा ध्यान अब तेजी से पीछे छुटते शहर, खेत- खलिहानों की तरफ न जाकर उनपर टीकी हुई थी और बाहर की तरफ देखने का मैं महज़ बहाना भर कर रहा था। उन दोनों में से एक व्यक्ति अचानक बैठे-बैठे हीं लपककर महिला के पैर के पास से पानी की रखी बोतल ले लिया और महिला के बांह से बोतल को छुआते हुये पुछा- "का मलाई, पानी ले लें? " महिला ने सकपकाते हुये 'हां' में सर हिला दिया और वो व्यक्ति खिखियाते हुये पानी पीने लगा। जो महिला मुझे पहले इत्मीनान-सी लगी थी, अब वही महिला मुझे लोगों से भरी गाड़ी में 'इत्मीनान' से बैठी नज़र नहीं आ रही थी। मैं सोच रहा था कि महिला के बगल में बैठे अन्य लोग उसके परिवार के सदस्य होंगे और वो इस हरकत का विरोध करेंगे। मगर वो भी कुछ चौकें से नज़र आयें। बगल में बैठे अन्य लोगों का कुछ 'रियेक्शन' न करता देख, मेरे दिमाग में बात आयी कि- कहीं यह महिला अपने परिवार के किसी सदस्य के बिना अकेले सफर तो नहीं कर रही है? मैं यह सोच ही रहा था कि तभी उन दोनों में से दूसरा व्यक्ति महिला के कमर पर हल्की-सी चिकोटी काटते हुये हाथ पीछे खींच लिया और हंसने लगा। इस बार महिला उसकी तरफ गुर्राते हुये देखा और फिर झिझकते हुये मुंह दूसरी तरफ फेर ली। मैं यह सब देखकर दंग था। मेरे मन में ये सवाल चल रहे थे कि- इतने सारे लोग हैं, आख़िर यह महिला इस अश्लील हरकत का विरोध क्यूँ नहीं करती? या फिर लोगों में से हीं कोई क्यों नहीं टोकता? ऐसे ही कई सवाल मेरे सागर रूपी मन में गोता लगा ही रहे थे कि कुछ देर बाद अचानक फिर से दूसरा व्यक्ति ने महिला के कमर में अपनी अंगुली धसाते हुये पीछे खींच लिया और हंसने लगा। इस बार महिला झिझकते हुये रूद्धें आवाज में कहा- "तुम ये काहे कर रहे हो? " और फिर से शांत हो गई। यह सब देखकर अब मुझे घुटन-सी महसूस होने लगी थी। मैं अपने को मन ही मन कोसने लगा था कि मैं अब तक चुप क्यों हूँ? क्या मुझे भी इस समय अन्य लोगों की तरह अंधे होने का ढ़ोंग करनी चाहिए? इसबार मेरे धमनियों के खून उबलने से लगे थें। मैंने खुद से फैसला कर चुका था कि इसबार मुझसे चुप नहीं रहा जायेगा और मैं उस विवश महिला से पुछ लूंगा कि - आप इतना बर्दाश्त क्यों कर रही हैं?... क्या वें आपके घर के हैं? या फिर उन बदतमीज़ युवाओं से इस तरह की दुस्साहस न करने को कहूंगा।
गाड़ी की रफ़्तार कम होने लगी थी। अगली 'स्टोपेज' ज्ञानपुर स्टेशन आने वाला था। कुछ देर बाद ट्रेन की रफ़्तार बहुत ही कम हो गई और स्टेशन का प्लेटफार्म दिखने लगा था। आचानक उन दोनों युवाओं में से पहला युवक मंद गति से चल रही ट्रेन से उतर गया। दूसरा व्यक्ति भी अंगड़ाई लेते हुए उठ खड़ा हुआ और गाड़ी का एकदम से रूक जाने का शायद इंतज़ार कर रहा था। गाड़ी स्टेशन पर रूकी और व्यक्ति महिला को लगभग पुकारते हुये कहा- " स्टेंड अप, पीक्को .... अपनी मंजिल आ गई" महिला भी इस बार खड़ी होकर उसके साथ स्टेशन पर उतरी और चलती चली जा रही थी।
मैं आश्चर्य से उस जाते हुए महिला को देखता रहा और सोचता रहा - क्या वो महिला उसके साथ थी? क्या उन दो युवाओं के हरकतों का विरोध कर मैं सही करता या ये मेरी गुस्ताखी होती? मेरे दिमाग़ में अभी भी गुंज रहा था..... "स्टेंड अप, पीक्को..!! "
🖊 आलोक रंजन
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गाड़ी की रफ़्तार कम होने लगी थी। अगली 'स्टोपेज' ज्ञानपुर स्टेशन आने वाला था। कुछ देर बाद ट्रेन की रफ़्तार बहुत ही कम हो गई और स्टेशन का प्लेटफार्म दिखने लगा था। आचानक उन दोनों युवाओं में से पहला युवक मंद गति से चल रही ट्रेन से उतर गया। दूसरा व्यक्ति भी अंगड़ाई लेते हुए उठ खड़ा हुआ और गाड़ी का एकदम से रूक जाने का शायद इंतज़ार कर रहा था। गाड़ी स्टेशन पर रूकी और व्यक्ति महिला को लगभग पुकारते हुये कहा- " स्टेंड अप, पीक्को .... अपनी मंजिल आ गई" महिला भी इस बार खड़ी होकर उसके साथ स्टेशन पर उतरी और चलती चली जा रही थी।
मैं आश्चर्य से उस जाते हुए महिला को देखता रहा और सोचता रहा - क्या वो महिला उसके साथ थी? क्या उन दो युवाओं के हरकतों का विरोध कर मैं सही करता या ये मेरी गुस्ताखी होती? मेरे दिमाग़ में अभी भी गुंज रहा था..... "स्टेंड अप, पीक्को..!! "
🖊 आलोक रंजन
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